छत्तीसगढ़

सेटिंग का साम्राज्य या प्रशासन की कमजोरी रिटायर एसडीओ फिर सिस्टम में सक्रिय?

कोरिया वनमण्डल में वनरक्षक से रिटायर होने तक का सफर?

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कोरिया( छत्तीसगढ़)कोरिया के वन विभाग में पारदर्शिता और नियमों की बात अक्सर कागज़ों तक सीमित रह जाती है। ताज़ा मामला कोरिया वन मंडल से सामने आया है, जहां एक पूर्व एसडीओ—जिनका सफर एक बीट गार्ड से शुरू होकर उच्च पद तक पहुंचा—सेवानिवृत्ति के बाद भी सिस्टम पर अपनी पकड़ बनाए हुए हैं।

सूत्रों के अनुसार, सेवानिवृत्त होने के बावजूद संबंधित अधिकारी ने “सेटिंग” के दम पर दोबारा वन मंडल में तेंदूपत्ता प्रभारी के रूप में एंट्री ले ली है। हैरानी की बात यह है कि विभागीय नियमों को ताक पर रखकर यह व्यवस्था लंबे समय से चल रही है और जिम्मेदार अधिकारी मौन साधे बैठे हैं।

“सेटिंग मैन” के नाम से पहचान
वन वृत में यह नाम अब किसी परिचय का मोहताज नहीं है। कर्मचारी और अधिकारी उन्हें “सेटिंग मैन” के नाम से जानते हैं। चर्चा है कि उनकी पहुंच सीधे शीर्ष स्तर तक है, और वे अपनी मर्जी से अधिकारियों के पदस्थापन तक प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

क्या नियम सिर्फ कागज़ों तक?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर एक सेवानिवृत्त कर्मचारी किस आधार पर विभागीय कार्य कर रहा है? क्या विभाग में योग्य और कार्यरत अधिकारी-कर्मचारियों की कमी है, या फिर जानबूझकर नए लोगों को अवसर नहीं दिया जा रहा?

जानकार बताते हैं कि प्रदेशभर में कई ऐसे उदाहरण हैं, जहां एसडीओ और रेंजर बिना नियमित पदस्थापना के “स्पेशल ड्यूटी” के नाम पर कार्य कर रहे हैं। इससे न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, बल्कि नई पीढ़ी के अधिकारियों का मनोबल भी टूटता है।

प्रशासन पर उठते सवाल
यह पूरा मामला वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या नियमों का पालन केवल दिखावे के लिए है? क्या प्रभावशाली लोगों के लिए अलग कानून चलता है?

यदि समय रहते इस पर ठोस कार्रवाई नहीं की गई, तो यह न सिर्फ विभाग की साख को नुकसान पहुंचाएगा, बल्कि भ्रष्टाचार और पक्षपात को भी खुला संरक्षण देगा।

अब देखना होगा कि जिम्मेदार अधिकारी इस मामले में क्या कदम उठाते हैं, या फिर यह “सेटिंग का खेल” यूं ही चलता रहेगा।

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